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नई पीढ़ी को समझ रहे हैं या उसे समाज से अलग कर रहे हैं?

आजकल एक शब्द बहुत तेजी से हमारे सामाजिक जीवन में प्रवेश कर गया है — Gen Z। इसके बाद Gen Alpha आया और अब ऐसा लगता है कि हर कुछ वर्षों के अंतराल पर पैदा होने वाली पीढ़ी के लिए एक नया नाम, नई पहचान और नई विशेषताएं तय की जा रही हैं.

लेकिन सवाल यहां से शुरू होता है —

क्या हम सचमुच पीढ़ियों को समझने के लिए उनका वर्गीकरण कर रहे हैं, या पीढ़ियों को अलग-अलग पहचान देकर उनके बीच दूरी पैदा करने की एक नई प्रक्रिया चल रही है?

नई पीढ़ी कोई अलग दुनिया से नहीं आती

हर पीढ़ी अपने समय के साथ बदलती है। तकनीक, जीवनशैली, काम करने के तरीके और संचार के साधन बदलते हैं — इसलिए सोच में बदलाव भी आएगा। लेकिन बदलाव का अर्थ यह नहीं कि नई पीढ़ी समाज से अलग हो गई.

अस्मिता जब संवाद की जगह टकराव पैदा करने लगे

अपनी पहचान होना गलत नहीं है, लेकिन पहचान को लगातार दूसरों से अलग साबित करना अलग बात है। जब स्वाभाविक अंतर सामाजिक दूरी में बदलता है, संवाद कमजोर हो सकता है.

अनुभव बनाम सहजता

एक ने परिवर्तन की यात्रा देखी है, तो दूसरी उस परिवर्तन के परिणामों के बीच बड़ी हुई है.

पुरानी पीढ़ी के पास अनुभव और स्मृतियां हैं; नई पीढ़ी के पास नई दृष्टि और नए प्रश्न हैं। दोनों को श्रेष्ठ और हीन साबित करने के बजाय एक-दूसरे के अनुभवों का पूरक बनाना आवश्यक है.

नई पीढ़ी को समझने का रास्ता लेबल नहीं, संवाद है

माता-पिता बच्चों से बात करें, शिक्षक विद्यार्थियों से संवाद करें, समाज युवाओं को सहभागी बनाए और युवा भी पिछली पीढ़ी को केवल पुरानी सोच का प्रतीक मानकर खारिज न करें.

नई पीढ़ी को बदलना नहीं, समझना होगा

बदलने का अर्थ बिगड़ना नहीं है, अलग सोचने का अर्थ समाज-विरोधी होना नहीं है, सवाल पूछने का अर्थ संस्कारहीन होना नहीं है, और नई तकनीक अपनाने का अर्थ जड़ों से कटना नहीं है.

अंतर स्वाभाविक है, लेकिन टकराव और अलगाव नहीं.

आखिर में सवाल हमारे सामने है

क्या हमें अपने बच्चों को 'Gen Z' कहकर उनसे दूरी बनानी है, या उन्हें अपनी सामाजिक यात्रा की अगली कड़ी मानकर गले लगाना है?

बच्चे कोई नई प्रजाति नहीं हैं और न ही नई पीढ़ी कोई अलग समाज है — वह हमारे ही समाज का अगला अध्याय है.

गौरव शर्मा
सामाजिक कार्यकर्ता